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Monday, August 9, 2010




क्या एक पत्रकार की मौत

(सोमवार /09 अगस्त 2010 / आवेश तिवारी /सोनभद्र )

कमलेश की लाश जहाँ पड़ी थी वहां की जमीन पर पड़ा खून अब जम गया है ,हमारा खून भी ये सुनने के बाद जम जाता है जब हमें गाँव वाले बताते हैं कि कमलेश की लाश को पुलिस ट्रेक्टर के हल पर रखकर ले गयी थी ,उसके पूर्व लगभग ८ घंटों तक जानकारी के बावजूद उसकी लाश को थाने ले जाने के बजाय सड़क से उठाकर बीच जंगल में कुत्तों और भेडियों को खाने के लिए छोड़ दिया गया था |कमलेश अपने जेब के पैसे खर्च करके बनियों के अखबार के चाकरी करने वाले देश के उन हजारों अखबारनवीसों में से एक था जिनकी पहचान उनके गाँवों कस्बों में ही सिमट कर रहा जाती है ,पूर्वी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद में पिछले एक सप्ताह से जारी धरना प्रदर्शन और गिरफ्तारियों के बावजूद पुलिस की तहकीकात का नतीजा सिफर है कमलेश की पिछली ३१ को हुई मौत के बाद मिले तमाम फोर्नेसिक सबूत जाने अनजाने में नष्ट कर दिए गए हैं |घटनास्थल से बरामद शीशे के टुकड़े पीयूसीएल के विकाश शाक्य कहते हैं ये क्या कम आश्चर्यजनक बात है कि एक पत्रकार की लाश का पोस्टमार्टम कराने में पुलिस को २० घंटे लग गए वहीँ पंचनामा भी पूरी तरह से फर्जी भरा गया ,पुलिस को सड़क पर लाश पड़े होने की सूचना लभई के ग्राम प्रधान ने रात को १२.१५ बजे ही दे दी थी लेकिन किन परिस्थितियों में पुलिस ने अपने रिकार्ड में अगले दिन ७.३० बजे का समय दर्ज किया इसका जवाब पुलिस के किसी भी अधिकारी के पास न था |सिर्फ इतना ही नहीं उसकी लाश के एक पैर में ही जूता और मोजा मिला ,दूसरे पैर का जूता दूर पड़ा मिला लेकिम मोजा गायब था इसका भी जिक्र कहीं नहीं किया गया |कमलेश की लाश को पुलिस के आदेश पर बीच जंगल में छोड़ने वाला ट्रैक्टर ड्राइवर कमल बताता है हमने साहब लोगों से कहा कम से कम उन्हें जीप में डाल लीजिये ,मगर वो मुझे धमकाकर ट्रेक्टर से ही लाश ले जाने को बोले |ग्रामीण बताते हैं कि पुलिस ने उस वक़्त जब उनके जेब से कागज़ निकाला तो उसमे मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार और सीमा पर हो रही सागौन की तस्करी को लेकर पुलिस के खिलाफ कुछ बातें लिखी थी,उस वक़्त एक सिपाही ने कहा भी कि साहब ये शायद कोई पत्रकार है लेकिन दरोगा ने उसकी बात अनसुनी कर दी |

जब हम उत्तर प्रदेश- छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित सोनभद्र के बैधन इलाके में पहुँचते हैं तो बेशकीमती अवैध लकड़ियों से लदे ट्रकों से पुलिस की खुलेआम वसूली का नजारा साफ़ दिखाई देता है ,कमलेश यहीं का रहने वाला था |वहां उसने माफियाओं और पुलिस के गठजोड़ के खिलाफ लगातार कलम चलायी ,इसका खामियाजा उसे बार बार उठाना पड़ा था ,गाजियाबाद के वर्तमान एसएसपी रघुबीर लाल जो कि उस वक़्त सोनभद्र में थे ने उसका मुंह बंद करने के लिए हर संभव कोशिश की थी,जब उसने एफ सी आई के गोदाम से लाखों टन अनाज को गायब कर गैरकानूनी बिक्री किये जाने के खिलाफ कई एपिसोड छापे थे | उत्तर प्रदेश के बैधन इलाके में बिजली अभी पिछले साल ही पहुंची है ,सीमा पर नक्सलियों द्वारा लगातार वारदातें किये जाने के बाद से ही शाम को गाड़ियों का परिवहन रुक जाता है ,पगडंडियों से होकर जब हम कमलेश के घर पहुँचते हैं तो चारों ओर गरीबी चीखती नजर आती है ,शोकाकुल महिलाएं हमें देखते ही बरबस रो पड़ती हैं ,दो भाई उपेन्द्र जिनमे से एक अंडे की रेहड़ी लगता है और दूसरा जो राजेंद्र कि ठेके पर छोटा मोटा काम करते हैं कहते हैं कि देखिये एक साल पहले हमारे एक भाई को मारकर तालाब में फेंक दिया था और अब कमलेश को मार दिया ,क्या हमें कभी न्याय मिलेगा ?भाई बताते हैं कि उसका मोबाइल और पैसे हमें मौके से नहीं मिले .वो घर से हिंडाल्को अपने भतीजे के मृत्यु की खबर सुनकर निकला था ,लेकिम खुद मारा गया |भाभी बताती हैं उस दिन वो बहुत रो रहा था ,बहुत प्यार करता था वो उसको ,हम समझ नहीं पाए वो अपने भाई के घर से लगभग 1० किमी आगे कैसे पहुँच गया?भाई बताते हैं बाहर वालों के लीए कितना साहसी क्यूँ न हो ,लेकिन वो तो अकेले सोने में भी डरता था |


बातचीत के दौरान परिजन कमलेश की एक व्यक्तिगत डायरी ले आये |डायरी के पन्नों पर कमलेश की लिखावट में लिखी इबारत “दरोगा ने व्यक्तियों को पांच दिन के लीए थाने में रखा फिर छोड़ दिया ,जबकि वही व्यक्ति कहीं न कहीं से मेरे भाई लाला की मौत के जिम्मेदार हैं” पुलिस के प्रति उसकी निराशा को साफ़ दिखला रही थी |कमलेश के साथी पत्रकार बताते हैं वो हम लोगों की ताकत था ,यहाँ कोई वन माफियाओं और लकड़ी के तस्करों के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश नहीं करता अगर कमलेश नहीं होता |शायद इसी वजह से वो सबकी आँखों की किरकिरी बना हुआ था ,अब हम अकेले पड़ गए हैं |सीमा पर तस्करी का धंधा फिर से शबाब पर है ,कलम खामोश है |

(आवेश तिवारी , डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में सोनभद्र के ब्यूरो चीफ़ हैं . )